महिलाओं के लिए ब्रह्माकुमारीज़ का शक्ति सत्र

महिलाओं के लिए ब्रह्माकुमारीज़ का शक्ति सत्र

प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय के धनबाद सेण्टर के ओर से गोविंदपुर स्थित अग्रसेन भवन में शक्ति सत्र का आयोजन किया गया, कार्यक्रम में अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मलेन, गोविंदपुर के पदाधिकारियों ने भाग लिया | महिला सम्मेलन कि सचिव सीमा सरिया के अनुरोध पर आयोजित शक्ति सत्र में ब्रह्माकुमारीज़ के धनबाद सेण्टर की प्रमुख अनु दीदी ने राजयोग के बारे में बताया |

Marwadi Mahila Samiti Govindpur and Brahma Kumaris Dhanbad

 

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Meena Bansal

ॐ शांति
मैं यहाँ आकर अपने आप बहुत हल्का महसूस कर रही हूँ, मैं अनु दीदी की बहुत बहुत आभारी हूँ जो मुझे शांति की ओर दर्शन करा रही थी | मैं चाहती हूँ ऐसी एक संस्था हो जो हम कभी दुखी हो, किसी के प्रति हमारी सोच गलत हो तो हम उससे सच्चा दर्शन आईना दिखने वाला हो, मैं यही कामना करती हूँ दीदी से |

Anju Saria

ॐ शांति ॐ
आत्मा की शांति के लिए बहुत ही अच्छा मार्गदर्शन | इस शांति की प्राप्ति के लिए मैं भी कोर्स करना चाहती हूँ |

Isha Agarwal

आज हमलोगो के बीच अनु दीदी आयी, बहुत बहुत सदर प्रणाम, बहुत अच्छा लगा, हमलोग आएंगे, मैं मारवाड़ी महिला समिति की अध्यक्ष ईशा अग्रवाल, हम सभी बहने कोर्स करना चाहते है |

Bimla Sharma

ॐ शांति ॐ
इसके बारे में आज हमें बहुत ही अच्छा ज्ञान प्राप्त हुआ | अनु दीदी ने बहुत ही अच्छा समझाया | आत्मा ओर परमात्मा के बारे में | और हम कैसे विचारो का आदान – प्रदान करते है | हम जैसा ही करेंगे वैसा ही हमें प्राप्त होता हैं |

Seema Saria

आज मुझे दीदी से मिलकर बहुत ही अच्छा लगा | हमारी कई बहनो ने मिलकर यह कोर्स करने को भी कहा हैं | हमारा आज का ही अनुभव इतना अच्छा था तो कोर्स के बाद तो हमें और भी अच्छा लगेगा |

Sunita Bansal and Renu Dudani

ॐ शांति
आज अनु दीदी से अपने ख़ुशी और दूसरे के खुशी को आपस में आदान – प्रदान करने से हम जीवन में कितना बदलाव ला सकते हैं, सुनकर बहुत अच्छा लगा | मैंने निर्णय लिया कि मै उनके पास जाकर क्लास करुँगी | आधे घंटे कि परिचर्चा इतनी अच्छी तो क्लास करके अपने में बहुत चेंज ला सकते हैं |

Sangita Saria

प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा आज हमारी समिति में जो कार्यक्रम हुआ उसमे हम सभी को आत्मिक शांति का अनुभव हुआ | मैंने राजयोग की क्लास की हैं | तो उसका अनुभव अद्भुत था | हम आज की आपा धापी और टेंशन की ज़िन्दगी में कुछ क्षण सुकून और शांति के खोजते हैं | लग रहा हैं वो तलाश अब पूरी हो रही हैं | आगे भी यह संकल्प हैं कि हम इस अनुभव को अपने जीवन को जीने का मंत्र बनाये और अपने परिवार और परिजनों को भी सिखाये |

 

छठ पूजा का आध्यात्मिक महत्तव Anu Didi Brahma Kumaris Dhanbad

छठ पूजा का आध्यात्मिक महत्तव

Anu Didi
Brahma Kumaris Dhanbad
@BKDhanbad

छठ पूजा का आध्यात्मिक महत्तव
छठ पूजा का आध्यात्मिक महत्तव

Spiritual significance of Chhath Puja

छठ विषेश

वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। सूर्य की उपासना की चर्चा सर्वप्रथम रिगवेद में मिलती है जहां देवता के रूप में सूर्य की वंदना का उल्लेख मिलता है।

उं सूर्य आत्मा जगतस्तस्युशष्च
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि षोक विनाषनम्
सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्।।

सृश्टि के संचालक और पालनकर्ता के रूप में सूर्य की उपासना और सूर्य को जगत की आत्मा, षक्ति व चेतना समझा जाना इन पंक्तियों में अंर्तनिहित है। सूर्योपनिशद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उत्पति का कारण निरूपित किया गया है और उन्हें ही संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्य को ही सम्पूर्ण जगत की अंतरात्मा माना गया है।

ब्रह्मवैर्वत पुराण में सूर्य को परमात्मा स्वरूप माना गया है। यजुर्वेद ने चक्षो सूर्यो जायत कहकर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। विष्व में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा जाता है अर्थात् हर कोई इनके साक्षात् दर्षन कर सकता है। षास्त्रों के अनुसार केवल भावना के द्वारा ही ध्यान और समाधि में ब्रह्मा, विश्णु, महेश आदि देवों का अनुभव हो पाता है। किन्तु भगवान सूर्य नित्य सबको प्रत्यक्ष दर्षन देते हैं। सूर्य स्थूल आंखों से साक्षात और सर्वसुलभ हैं और यही कारण है कि ज्ञान सूर्य अर्थात् परमपिता परमात्मा के स्थान पर भौतिक प्रकाष पुंज यानि कि देवता सूर्य की अराधना द्वापर काल से आरंभ हो गई।

छान्दोग्योपनिशद में सूर्य को प्रणव औंकार उं निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। यह कहानी प्रचलित है कि प्रथम बार जब दैत्य-दानवों ने मिलकर देवताओं को पराजित कर दिया था तब देवताओं की माता अदिति ने अपने पुत्रों की हार से व्यथित होकर देवता सूर्य से कहा कि- हे भक्तों पर कृपा करने वाले प्रभु! मेरे पुत्रों का राज्य एवं यज्ञ दैत्यों एवं दानवों ने छीन लिया है।

आप अपने अंष से मेरे गर्भ द्वारा प्रकट होकर पुत्रों की रक्षा करें। अदिति गर्भवती हुईं किंतु उनके पति कष्यप क्रोध में गर्भस्थ षिषु को मृत षब्द से संबोधित कर बैठे। उसी समय अदिति के गर्भ से एक प्रकाषपुंज बाहर आया जिसे देखकर कष्यप भयभीत हो गए। कष्यप ने क्षमा-याचना की और आकाषवाणी हुई कि ये दोनो इस पुंज का प्रतिदिन पूजन करें और उचित समय पर पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जो आदित्य व मार्तण्ड नाम से विख्यात हुआ। आदित्य का तेज प्रचण्ड था और युद्ध में इनका तेज देखकर ही दैत्य पलायन कर गए।

पहले सूर्योपासना मंत्रों से होती थी और बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ जो भविश्य पुराण में ब्रह्मा-विश्णु के मध्य संवाद के रूप में दर्ज है। सूर्य देवता सात विषाल एवं मजबूत घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथ पर सवार होते हैं। इन घोड़ों की लगाम लालिमा युक्त अरूण देव के हाथ में होती है और स्वंय सूर्य देवता पीछे रथ पर विराजमान होते हैं।

अन्य देवों की सवारी देखें तो श्री कृश्ण द्वारा चलाए गए अर्जुन के रथ के भी चार ही घोड़े थे, फिर सूर्य देवता के सात घोड़े क्यों? कई बार एक घोड़े पर सात सिर बनाकर मूर्ति बनाई जाती है ठीक उसी प्रकार से जैसे सूरज की रोषनी से सात अलग रंगों की रोषनी निकलती है। सूर्य के सात घोड़ों को भी इन्द्रधनुश के सात रंगों से जोड़ा जाता है, इसलिए प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न है और एक दूसरे से मेल नहीं खाता है। किरणें जैसेकि बैंगनी आनंद, गहरा नीला ज्ञान, आसमानी षांति, हरा रूहानी प्रेम, पीला सुख, नारंगी पवित्रता, लाल षक्ति का प्रतीक है।

प्रकाष पुंज ईष्वर से निकलने वाले सातो रंग इन्हीं गुणों के प्रतीक हैं जिससे जुड़कर आत्मा में मनोवांछित फल प्राप्त करने की खूबी आती है इसलिए अरूण देव द्वारा एक ओर रथ की कमान तो संभाली ही जाती लेकिन रथ चलाते हुए भी वे सूर्य देव की ओर मुख करके ही बैठते हैं। इस बड़े रथ को चलाने के लिए केवल एक पहिया मौजूद है और यह एक पहिया एक कल्प को दर्षाता है। विश्णु के लिए प्रयुक्त नारायण विषेशण का प्रयोग सूर्य देव के लिए भी होता है। विश्णु और सूर्य देव के संबंध षतपथ ब्राह्मण में स्पश्ट है जिसके अनुसार सूर्य देवता विश्णु जी के भौतिक उर्जा हैं। बृहत संहिता कहता है कि सूर्य देवता को दो हाथों से दिखाया जाना चाहिए और एक ताज पहनाया जाना चाहिए। किन्तु विश्णुधर्मोतम के अनुसार आकृतिचित्र में सूर्य के चार हाथ दिखाए जाने चाहिए, दो हाथों में पवित्रता सूचक कमल पुश्प, तीसरे में धर्मराज रूपी सोंटा और चैथे में लेखन उपकरण जैसे कि कुंडी-पत्र और कलम होने चीहिए जो ज्ञान का प्रतीक है।

गणेष जी की पूजा चतुर्थी को, विश्णु की पूजा एकादषी को आदि आदि। सूर्य सप्तमी, रथ सप्तमी से स्पश्ट है कि सूर्य की पूजा के साथ सप्तमी तिथि जुड़ी है। लेकिन छठ में सूर्य का शश्ठी के दिन पूजन अनोखी बात है। सूर्यशश्ठी व्रत में ब्रह्म और षक्ति दोनों की पूजा साथ-साथ की जाती है इसलिए व्रत करने वालों को दोनो की पूजा का फल मिलता है। यही बात इस पूजा को सबसे खास बनाती है।
महिलाओं ने छठ के लोकगीतों में इस पौराणिक परंपरा को जीवित रखा हैः

‘‘अन-धन सोनवा लागी पूजी देवलघरवा हे,
पुत्र लागी करीं हम छठी के बरतिया हे‘‘

इसमें व्रती कह रही हैं कि वे अन्न-धन, संपति आदि के लिए सूर्य देवता की पूजा कर रही हैं और संतान के लिए ममतामयी छठी माता या शश्ठी पूजन कर रही हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड में बताया गया है कि सृश्टि की अधिश्ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंष को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंष होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम शश्ठी है। पुराण के अनुसार, ये देवी सभी बालकों की रक्षा करती हैं और उन्हें लंबी आयु देती हैं।

शश्ठांषा प्रकृतेर्या च सा शश्ठी प्रकीर्तिता।
बलकाधिश्ठातृदेवी विश्णुमाया च बालदा।।
आयुःप्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी।
सततं षिषुपाष्र्वस्था योगेन सिद्धयोगिनी।।

छठ का व्रत कठिन होता है इसलिए इसे महाव्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन छठी देवी की पूजा की जाती है। षष्ठीदेवी को ही स्थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है। छठ व्रत कथा के अनुसार छठी देवी ईष्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं।

देवसेना प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंष से उत्पन्न हुई हैं। षष्ठीदेवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है। बच्चों की रक्षा करना इनका स्वभाविक गुण धर्म है। इन्हें विश्णुमाया तथा बालदा अर्थात पुत्र देने वाली भी कहा गया है। कहा जाता है कि जन्म के छठे दिन जो छठी मनाई जाती है वह इन्हीं षष्ठी देवी की पूजा की जाती है।

पुराणों के अनुसार मां छठी को कात्यायनी नाम से भी जाना जाता है और नवरात्री की षष्ठी को इन्हीं की पूजा की जाती है। कात्यायनी को भी षिषुप्रदा व आयुश्प्रदा और बालकों की रक्षिका देवी की ख्याती प्राप्त है और ये षष्ठी देवी का ही रूप हैं। गोधूली वेला के समय गंगाजल से स्नान के पषचात् कात्यायनी देवी की पूजा करना सबसे उतम है।

अर्थात् छठ पूजा ज्ञान सूर्य परमपिता परमात्मा षिव की अराधना है। आधे कल्प से आत्मा को विस्मृत कर चुके मानव जाति प्रकाष पुंज को भौतिक सूर्य समझ बैठे हैं और पवित्रता पर्व का सीमित लाभ ले पा रहे हैं। छठी देवी उन्हीं परमात्मा की षिव-षक्ति हैं जो ज्ञान तलवार धारण कर अंधकार मिटाकर सतयुग का अनावरण करेंगी। छठ पर्व जाने वाले युग अर्थात् कलियुग का विदाई समारोह है और आनेवाले कल्प का उद्धाटन पर्व है किन्तु स्थूलता ने दिक्भ्रमित कर दिया है।

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Raksha Bandhan Par Vishesh by Anu Didi

Raksha Bandhan Par Vishesh by Anu Didi

रक्षा बंधन पर विशेष – अनु दीदी
आत्म- भान में टिकने का टीका, बनना है मीठा, ये लो मीठा |
ख़ुशी में झुलाती, मिलाके शिव-साथी.
संगम की कल्याणकारी राखी |

रक्षा बंधन के त्यौहार के बारे में अधिकतर लोगो की यही मान्यता चली आ रही हैं कि यह त्यौहार भाई द्वारा बहन की रक्षा का संकल्प लेने का प्रतीक हैं | साथ-साथ ये भी कहा जाता है कि यह त्यौहार हमारे देश में चिरकाल से मनाया जाता रहा हैं | ये दोनों ही बातें हमें इस विवेचना के लिए तैयार करते हैं कि रक्षा बंधन जैसा पवित्रता और स्नेह-हंसी ख़ुशी से जुड़े पर्व की बुनियाद को असुरक्षा की भावना मानना कितना न्याय संगत हैं?

यदि हमारे देश में हर बहन अपने भाई को हर वर्ष रक्षा सूत्र बांधती थी, तो क्या हमारे देश में अपराध इतना बढ़ा हुआ था कि हर कन्या, माता, बहन को भय बना हुआ था और वह अपने लाज को खतरे में महसूस करती थी | इतिहास के अनुसार भारत में घर के दरवाजे खुले रहते थे क्योकि चोरी-चाकरी का कोई भय नहीं था | इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि राजा के गुप्तचर वेश बदलकर पता लगाते थे कि किसी पर अत्याचार तो नहीं हो रहा, कोई दुखी तो नहीं और कोई अपनी जान व माल को खतरे में तो महसूस नहीं करता? यहाँ तक कहा जाता है कि राजा स्वयंग वेश बदलकर अपनी प्रजा की हालत का पता लगाता था |

ऐसी स्थिति में रक्षा की समस्या का ऐसा विकराल रूप तो रहा ही नहीं होगा कि हर बहन अपने भाई को हर वर्ष राखी बांधे | भारत के लोग स्वयंग ही कहते हैं कि भारत देव भूमि था | यहाँ पर ऐसे आख्यान घर-घर पढ़े जाते है जिसमें यह बताया गया है कि एक नारी के चुराए जाने पर चुराने वाले की सारी सत्ता धवस्त कर दी गई | हमारे देश में ये कहा जाता है कि रक्षा करने का कर्त्तव्य क्षत्रियों का था | यदि किसी पर अत्याचार होता था या कोई दुराचार पर ही उतर आता तो क्षत्रिय लोग दुराचार का अंत करने के लिए अपनी जान की बाजी तक लगा देते थे | आतताइयों का सामना करना वे अपना धर्म मानते |

तब क्या ऐसा माना जाये कि देश में शताब्दियों में ऐसे क्षत्रिय ही नहीं रहे थे कि जो माताओं-बहनों की रक्षा के लिए अपने क्षात्र-बल का प्रयोग करते और अपने धर्म का पालन करते! भारत में युग-युगांतर ये नैतिकता और मर्यादा का वातावरण रहा है | हर व्यक्ति अपने गांव की बहन को, दूसरे गांव में चले जाने पर भी सदा अपने गांव की बहन मानकर एक भ्रातृत्व स्नेह की दृष्टि से व्यवहार करता था | ऐसी व्यवस्था में और ऐसे वातावरण में भला अपने मान की रक्षा को एक समस्या मानकर अपने भाई को राखी बांधने का प्रश्न की कैसे उठ सकता था? दरअसल मनुष्य मुख्यतः पांच प्रकार की रक्षा चाहता है – तन की रक्षा, धर्म, सतीत्व की रक्षा, काल से और माया के विघ्नों से रक्षा | परन्तु प्रश्न यह है कि क्या कोई मनुष्य इन् पांचो प्रकार की रक्षा करने में समर्थ है भी?

सर्वप्रथम तन की रक्षा पर विचार कर लीजिये | तन की रक्षा के लिए मनुष्य अनेक कोशिशें करता है परन्तु अंत में उसे यही कहना पड़ता है कि जिसकी मौत आयी हो उसे कोई नहीं बचा सकता है अर्थात भावी टालने से नहीं टलती | दुष्टो से पवित्रता की रक्षा भी वास्तव में सर्वसमर्थ परमपिता परमात्मा ही कर सकते हैं | इसलिए आख्यान प्रसिद्ध है कि कौरवों की भरी सभा में जब द्रौपदी का चीर हरण होने लगा तो द्रौपदी ने भगवान को ही पुकारा था क्योंकि तब कोई मित्र या सम्बन्धी उसकी रक्षा नहीं कर सका था | मनुष्य तो स्वयंग कालाधीन है और बड़े-बड़े योद्धाओं को भी आखिर काल खा जाता है | विश्व विजेता सिकंदर का उदहारण हमारे सामने है |

काल से बचने के लिए मनुष्य महामृत्युंजय पाठ कराता हैं अर्थात परमात्मा शिव की ही शरण में जाने की कामना करता हैं | परमात्मा को ही संकट मोचन, दुःख भंजन और सुख दाता कहते हैं और माया के बंधन से भी परमात्मा ही छुड़ाते हैं तभी तो मनुष्य परमात्मा को पुकारकर कहते हैं – विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा | वैसे भी मानव स्वाभाव से स्वतंत्रता प्रेमी हैं और जिस बात को वह बंधन समझता हैं उससे छूटने का प्रयत्न करता हैं | परन्तु रक्षा बंधन को बहने और भाई त्योहार अथवा उत्सव समझकर ख़ुशी से मनाते हैं | यह एक न्यारा और प्यारा बंधन हैं | हम देखते हैं कि बहन के अतिरिक्त ब्राह्मण भी यजमान को राखी बांधते हैं और बांधते हुए उसे वे कहते हैं कि इन्द्राणी ने भी इन्द्र को राखी बाँधी थी और उससे इन्द्र को विजय प्राप्त हुई थी |

यदि यह त्योहार भाई द्वारा बहन की रक्षा के संकल्प का प्रतीक होता तो आज तक ब्राह्मणों द्वारा राखी बांधने का रिवाज़ न चला आता | इससे तो यह विदित होता हैं कि यह त्योहार बहनों को भी ब्राह्मणों का दर्जा देकर और भाई को यजमान की तरह से राखी बांधने का प्रतीक हैं क्योंकि दोनों द्वारा राखी बँधाये जाने की रीति भी सामान हैं |

दरअसल यह एक धार्मिक त्योहार हैं और यह इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के संकल्प का सूचक हैं अर्थात भाई-बहन के नाते में जो मन,वचन और कर्म की पवित्रता समय हुई हैं, उसका बोधक हैं | पुनःश्च, यह ऐसे समय की याद दिलाता हैं जब परमपिता परमात्मा ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा कन्याओं-माताओं को ब्राह्मण पद पर आसीन किया, उन्हें ज्ञान का कलश दिया और उन द्वारा भाई-बहन के सम्बन्ध की पवित्रता की स्थापना का कार्य किया जिससे पवित्र सृष्टि की स्थापना हुई | उसी पुनीत कार्य का आज पुनरावृति हो रही हैं | ब्रह्माकुमारी बहने ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग द्वारा ब्राह्मण पद पर आसीन होकर राखी बांधकर बहन-भाई के शुद्ध स्नेह और पवित्रता के शुद्ध संकल्प की रक्षा करती हैं |

Janmashtami Par Vishesh by Anu Didi

Janmashtami Par Vishesh by Anu Didi – Happy Birthday Sri Krishna !

श्री कृष्णा का जन्मदिन भारतवासी जन्माष्टमी महोत्सव के नाम से मनाते हैं | भादो मास में कृष्ण पक्ष में जो अष्टमी आती है उस दिन लोग श्री कृष्णा का जनम हुआ मानते हैं | श्री कृष्णा का जन्मदिन भारत के हर नगर में बहुत ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है | जन्माष्टमी के अवसर पर हम आज श्रीकृष्ण की वास्तविक कहानी की मधुर चर्चा करते हैं ताकि हमारा जीवन भी उनके गुणो को सामने रखकर दिव्य बन जाये |

वैसे तो संसार में रिवाज़ है कि छोटी आयु के बच्चे बड़ो के आगे माथा झुकाते है परन्तु श्रीकृष्ण चाहे कितनी ही छोटी आयु के क्यों न हो उन्हें सभी बाल-वृद्ध और महात्मा भी नमस्कार करते हैं | श्रीकृष्ण की आरती करते हुए लोग भाव-विभोर होकर गाते है – आरती युगल किशोर कीजे, तन, मन, धन सब अर्पण कीजे. श्रीकृष्ण किशोर का जब स्वांग बनाया जाता है तब लोग आपने हाथ से नोट अथवा पैसे लेकर उस पर भी वारी-फेरी अथवा न्योछावर करते है |

अवश्य ही हमारे मन में श्रीकृष्ण के लिए बहुत सम्मान और स्नेह, अवस्य ही हम श्रीकृष्ण को इतना उच्च मानते हैं कि उन पर वारी जाते है और उसकी पूजा करते हैं | इसमें गौर करने कि बात यह है कि दूसरे जो भी प्रसिद्ध व्यक्ति हुए है जिनके जन्म-दिन एक सार्वजनिक उत्सव बन गए है | वे कोई जनम से ही पूज्य या महान नहीं थे | विवेकानंद सन्यास के बाद महान माने गए, महात्मा गाँधी प्रौढ़ अवस्था में ही एक राजनितिक नेता अथवा संत के रूप में प्रसिद्ध हुए आदि आदि | परन्तु श्रीकृष्ण जनम से ही पूज्य पदवी को प्राप्त है |

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते समय यह भी मालूम रहना चाहिए कि श्रीनारायण का जन्मोत्सव भी यही है | श्रीकृष्ण और श्रीनारायण दो अलग-अलग देवता होते तो श्रीनारायण की अपनी ही अलग कोई जीवन कहानी मिलती | श्रीनारायण के चित्रों में उनका शरीर सदा प्रौढ़ अवस्था वाला ही दर्शाया गया होता है और श्रीकृष्ण के चित्र किशोर रूप में तथा मूर्तियां भी कुमार एवं युवा अवस्था की मिलती है | दरअसल यह दोनों एक ही देवता के विभिन अवस्थाओं के नाम हैं |

भारत में यह प्रथा थी कि स्वयंबर होने पर वर और वधु दोनों का नाम बदल दिया जाता था | आज तक भी भारत में कई कुलों में यह प्रथा चल रही है | इसके अनुसार श्रीकृष्ण का नाम स्वयंबर के पश्चात् बदलकर श्रीनारायण हुआ था | जहाँ श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापित की जाती है उसके चारो और ऐसा घेरा बना दिया जाता है कि भक्त लोग उनकी मूर्ति को नहीं छू सकते | मंत्रो द्वारा देव का आहवान करने के बाद आखिर भक्त मूर्ति क्यों नहीं छू सकते? कारण यह है कि श्रीकृष्ण अतयंत पवित्र थे जबकि आज का मनुष्य काम-क्रोध के कारण पतित है |

श्रीकृष्ण को शिशुकाल से ही रत्न मुकुट तथा प्रकाश का ताज प्राप्त था और इस कारन बहुत लोग श्रीकृष्ण को भगवान मान बैठे हैं | वास्तव में लोग श्रीकृष्ण के पूर्व जन्म को न जानने के कारण उन्हें भगवान मानने की भूल करते है | श्रद्धा भाव से ओत-प्रोत मानव का स्वभाव है कि वह जिसमे भी अधिक गुण देखता है अथवा कुछ न्यारापन देखता है | उसे वह भावना-वश भगवान कह बैठता है | ठीक यही बात श्रीकृष्ण के बारे में भी घटित होती है | श्रीकृष्ण न्यारे तो थे परन्तु उनका न्यारापन कमल पुष्प के समान था |

वे संसार में रहते हुए पवित्र थे और उसमे आसक्त नहीं थे | इस अर्थ में वे महान और न्यारे थे परन्तु भगवान का न्यारापन इससे भिन्न तरह का है | भगवान तो जनम-मरण से ही न्यारे है, सुख-दुःख से भी न्यारे है | श्रीकृष्ण ने जन्म तो लिया ही था और सुख भी भोगा ही था | अतः उन्हें शिरोमणि देवता कहेगे परन्तु भगवान नहीं | श्रीकृष्ण तो वास्तव में भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है | जैसे बालक को देखकर पिता की याद आती है, किसी सूंदर कृति को देखकर उसके कर्ता की याद आती है, वैसे ही श्रीकृष्ण का चित्र देखकर उसके रचयिता स्वयंग भगवान शिव की याद आनी चाहिए |

जन्म से ही पवित्रता का ताज तथा रत्न जड़ित ताज प्राप्त होने से सिद्ध है कि श्रीकृष्ण ने पूर्व जन्म में कोई बहुत ही महान पुरुषार्थ किया होगा जिसके फलस्वरूप उन्हें स्वस्थ एवं सर्वांग सूंदर तन, अति निर्मल मन, अतुल धन और अनुपमेय सम्मान प्राप्त हुआ | तन, धन, प्रकाश का ताज – यह भी तो कर्म और संस्कार अथवा पुरुषार्थानुसार ही प्राप्त होते है | उन्होंने पूर्व जन्म में विकारों का संपूर्ण सन्यास किया होगा तभी वे इस जन्म में बचपन से ही निर्विकारी कहलाये |

आज श्रीकृष्ण की महानता को नहीं जानने के कारण लोग उनपर निराधार कलंक लगाते है | मीरा ने श्रीकृष्ण को याद किया तो उससे काम विकार छूट गया | सूरदास को भी सन्यास करने के बाद आँखों ने धोखा दिया | परन्तु जब वे श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति करने लगे तब उनसे भी काम विकार छूट गया | काम विकार को छोड़ने के बाद ही मीरा और सूरदास को श्रीकृष्ण के दर्शन हुए | तब क्या स्वयंग श्रीकृष्ण में इतनी वासना थी कि उन्होंने एक लाख साठ हज़ार संतति पैदा की और 16000 रानियाँ रखी |

श्रीकृष्ण को तो ‘मदन मोहन’ कहा जाता है अर्थात वे काम या मदन के वश नहीं थे बल्कि काम उनके वश था | अतः उनमे काम विकार का वश मानना श्रीकृष्ण के बारे में मिथ्या अलाप करना है | आज श्रीकृष्ण का एक क्षण साक्षात्कार करने के लिए भी मनुष्य को बहुत साधना करनी पड़ती है और पवित्रता एवं नियमो का पालन करना पड़ता है | और दृष्टि दिव्य करनी पड़ती है |

तो क्या जब वे साकार रूप में पृथ्वी पर होंगे तो क्या कंस, जरासंघ, शिशुपाल जैसे व्यक्ति उन्हें देख सकते थे और आज लोग साधना करने पर भी उन्हें नहीं देख सकते? जबकि मंदिर में लोग इसलिए जाते हैं कि उनकी दृष्टि-वृति पवित्र हो, तो सोचने की बात यह है कि जब साक्षात् श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर साकार होंगे तो क्या यह देश मंदिर के सामान पवित्र नहीं होगा और यहाँ के लोग पवित्र नहीं होंगे?

श्रीकृष्ण के समय यही भारत वैकुण्ठ था, यह समस्त देश मंदिर के सामान पवित्र था और यहाँ के वासी देवी-देवता थे | जब कोई व्यक्ति सम्पति, वस्तु अथवा पदार्थ का मुख्य भाग स्वयंग ले लेता हैं तो हम मुहावरे में कहा करते हैं कि ‘मक्खन तो वह ले गया’ | चूँकि श्रीकृष्ण को सतयुगी सृष्टि का स्वराज्य मिला जिसमे सुख के सभी सार थे, इसलिए हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण के हाथ में मक्खन आ गया | इस मुहावरे को आख्यान बनाकर लोगो ने यह लिख डाला कि मटके फोड़कर मक्खन चुराया करते थे | वर्तमान समय कलियुग के अंत में ब्रह्मचर्य का व्रत लेनेवाले योगीजन, संपूर्ण पवित्रता को प्राप्त करने के पश्चात् अर्थात तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने के पश्चात् ही सतयुग के आदि में श्रीकृष्ण के सच्चे जन्मदिन को अपने नेत्रों से देख सकते हैं और स्वर्ग अथवा सतयुग में गोप-गपियाँ बन श्रीकृष्ण के साथ मंगल-मिलन भी मना सकते हैं |

Adbhut Matrutva Program by Brahma Kumaris Dhanbad

Adbhut Matrutva Program by Brahma Kumaris Dhanbad

Adbhut Matrutva, A FOGSI Initiative, Towards a Safe Delivery

A Workshop on Role of gynecologists in empowering future generations through Adbhut Matrutva, a Garbhsanskar Project.

Launched in 2018, Adbhut Matrutva is a FOGSI initiative and is expected to reduce pregnancy related complications and death. This unique programme is expected to counter fetal origin of adult diseases and hence will be instrumental in shaping future generations.

Official Website –www.adbhutmatrutva.com 

Date – Sunday, 30th September, 2018
Venue – PMCH Auditorium, Saraidhela, Dhanbad
Timing – 10 AM to 1 PM
Mobile – 09334016268, 9835356415

Adbhut Matrutva Program by Brahma Kumaris Dhanbad
Adbhut Matrutva Program by Brahma Kumaris Dhanbad
Adbhut Matrutva Program in PMCH Dhanbad
Adbhut Matrutva Program in PMCH Dhanbad

 

BK Anu Didi Women of The Year Award

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रभात खबर ने महिलाओ को किया सम्मानित

बी के अनु दीदी को विमेंस ऑफ़ द ईयर का सम्मान

प्रभात खबर ने नारी शक्ति के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए इस साल भी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस(8 मार्च) के मौके पर सम्मान समारोह का आयोजन JN कॉलेज बैंक मोर में किया, इसमें विभिन्न क्षेत्रो में बेहतर काम करने के लिए 36 महिलाओ को सम्मानित किया, अनु दीदी को विमेंस ऑफ़ द ईयर का सम्मान दिया गया |

BK Anu didi women of the year award 2018 brahma kumaris dhanbad
BK Anu didi women of the year award 2012 . brahma kumaris dhanbad
Anu Didi Women of the year 2018 dhanbad
Anu Didi Women of the year 2012 dhanbad
Anu Didi Women of the year award 2018 dhanbad
Anu Didi Women of the year award 2012 dhanbad
international women day 8 march 2018 bk anu didi
International women day 8 march 2012 bk anu didi