Janmashtami Par Vishesh by Anu Didi

Janmashtami Par Vishesh by Anu Didi – Happy Birthday Sri Krishna !

श्री कृष्णा का जन्मदिन भारतवासी जन्माष्टमी महोत्सव के नाम से मनाते हैं | भादो मास में कृष्ण पक्ष में जो अष्टमी आती है उस दिन लोग श्री कृष्णा का जनम हुआ मानते हैं | श्री कृष्णा का जन्मदिन भारत के हर नगर में बहुत ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है | जन्माष्टमी के अवसर पर हम आज श्रीकृष्ण की वास्तविक कहानी की मधुर चर्चा करते हैं ताकि हमारा जीवन भी उनके गुणो को सामने रखकर दिव्य बन जाये |

वैसे तो संसार में रिवाज़ है कि छोटी आयु के बच्चे बड़ो के आगे माथा झुकाते है परन्तु श्रीकृष्ण चाहे कितनी ही छोटी आयु के क्यों न हो उन्हें सभी बाल-वृद्ध और महात्मा भी नमस्कार करते हैं | श्रीकृष्ण की आरती करते हुए लोग भाव-विभोर होकर गाते है – आरती युगल किशोर कीजे, तन, मन, धन सब अर्पण कीजे. श्रीकृष्ण किशोर का जब स्वांग बनाया जाता है तब लोग आपने हाथ से नोट अथवा पैसे लेकर उस पर भी वारी-फेरी अथवा न्योछावर करते है |

अवश्य ही हमारे मन में श्रीकृष्ण के लिए बहुत सम्मान और स्नेह, अवस्य ही हम श्रीकृष्ण को इतना उच्च मानते हैं कि उन पर वारी जाते है और उसकी पूजा करते हैं | इसमें गौर करने कि बात यह है कि दूसरे जो भी प्रसिद्ध व्यक्ति हुए है जिनके जन्म-दिन एक सार्वजनिक उत्सव बन गए है | वे कोई जनम से ही पूज्य या महान नहीं थे | विवेकानंद सन्यास के बाद महान माने गए, महात्मा गाँधी प्रौढ़ अवस्था में ही एक राजनितिक नेता अथवा संत के रूप में प्रसिद्ध हुए आदि आदि | परन्तु श्रीकृष्ण जनम से ही पूज्य पदवी को प्राप्त है |

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते समय यह भी मालूम रहना चाहिए कि श्रीनारायण का जन्मोत्सव भी यही है | श्रीकृष्ण और श्रीनारायण दो अलग-अलग देवता होते तो श्रीनारायण की अपनी ही अलग कोई जीवन कहानी मिलती | श्रीनारायण के चित्रों में उनका शरीर सदा प्रौढ़ अवस्था वाला ही दर्शाया गया होता है और श्रीकृष्ण के चित्र किशोर रूप में तथा मूर्तियां भी कुमार एवं युवा अवस्था की मिलती है | दरअसल यह दोनों एक ही देवता के विभिन अवस्थाओं के नाम हैं |

भारत में यह प्रथा थी कि स्वयंबर होने पर वर और वधु दोनों का नाम बदल दिया जाता था | आज तक भी भारत में कई कुलों में यह प्रथा चल रही है | इसके अनुसार श्रीकृष्ण का नाम स्वयंबर के पश्चात् बदलकर श्रीनारायण हुआ था | जहाँ श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापित की जाती है उसके चारो और ऐसा घेरा बना दिया जाता है कि भक्त लोग उनकी मूर्ति को नहीं छू सकते | मंत्रो द्वारा देव का आहवान करने के बाद आखिर भक्त मूर्ति क्यों नहीं छू सकते? कारण यह है कि श्रीकृष्ण अतयंत पवित्र थे जबकि आज का मनुष्य काम-क्रोध के कारण पतित है |

श्रीकृष्ण को शिशुकाल से ही रत्न मुकुट तथा प्रकाश का ताज प्राप्त था और इस कारन बहुत लोग श्रीकृष्ण को भगवान मान बैठे हैं | वास्तव में लोग श्रीकृष्ण के पूर्व जन्म को न जानने के कारण उन्हें भगवान मानने की भूल करते है | श्रद्धा भाव से ओत-प्रोत मानव का स्वभाव है कि वह जिसमे भी अधिक गुण देखता है अथवा कुछ न्यारापन देखता है | उसे वह भावना-वश भगवान कह बैठता है | ठीक यही बात श्रीकृष्ण के बारे में भी घटित होती है | श्रीकृष्ण न्यारे तो थे परन्तु उनका न्यारापन कमल पुष्प के समान था |

वे संसार में रहते हुए पवित्र थे और उसमे आसक्त नहीं थे | इस अर्थ में वे महान और न्यारे थे परन्तु भगवान का न्यारापन इससे भिन्न तरह का है | भगवान तो जनम-मरण से ही न्यारे है, सुख-दुःख से भी न्यारे है | श्रीकृष्ण ने जन्म तो लिया ही था और सुख भी भोगा ही था | अतः उन्हें शिरोमणि देवता कहेगे परन्तु भगवान नहीं | श्रीकृष्ण तो वास्तव में भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है | जैसे बालक को देखकर पिता की याद आती है, किसी सूंदर कृति को देखकर उसके कर्ता की याद आती है, वैसे ही श्रीकृष्ण का चित्र देखकर उसके रचयिता स्वयंग भगवान शिव की याद आनी चाहिए |

जन्म से ही पवित्रता का ताज तथा रत्न जड़ित ताज प्राप्त होने से सिद्ध है कि श्रीकृष्ण ने पूर्व जन्म में कोई बहुत ही महान पुरुषार्थ किया होगा जिसके फलस्वरूप उन्हें स्वस्थ एवं सर्वांग सूंदर तन, अति निर्मल मन, अतुल धन और अनुपमेय सम्मान प्राप्त हुआ | तन, धन, प्रकाश का ताज – यह भी तो कर्म और संस्कार अथवा पुरुषार्थानुसार ही प्राप्त होते है | उन्होंने पूर्व जन्म में विकारों का संपूर्ण सन्यास किया होगा तभी वे इस जन्म में बचपन से ही निर्विकारी कहलाये |

आज श्रीकृष्ण की महानता को नहीं जानने के कारण लोग उनपर निराधार कलंक लगाते है | मीरा ने श्रीकृष्ण को याद किया तो उससे काम विकार छूट गया | सूरदास को भी सन्यास करने के बाद आँखों ने धोखा दिया | परन्तु जब वे श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति करने लगे तब उनसे भी काम विकार छूट गया | काम विकार को छोड़ने के बाद ही मीरा और सूरदास को श्रीकृष्ण के दर्शन हुए | तब क्या स्वयंग श्रीकृष्ण में इतनी वासना थी कि उन्होंने एक लाख साठ हज़ार संतति पैदा की और 16000 रानियाँ रखी |

श्रीकृष्ण को तो ‘मदन मोहन’ कहा जाता है अर्थात वे काम या मदन के वश नहीं थे बल्कि काम उनके वश था | अतः उनमे काम विकार का वश मानना श्रीकृष्ण के बारे में मिथ्या अलाप करना है | आज श्रीकृष्ण का एक क्षण साक्षात्कार करने के लिए भी मनुष्य को बहुत साधना करनी पड़ती है और पवित्रता एवं नियमो का पालन करना पड़ता है | और दृष्टि दिव्य करनी पड़ती है |

तो क्या जब वे साकार रूप में पृथ्वी पर होंगे तो क्या कंस, जरासंघ, शिशुपाल जैसे व्यक्ति उन्हें देख सकते थे और आज लोग साधना करने पर भी उन्हें नहीं देख सकते? जबकि मंदिर में लोग इसलिए जाते हैं कि उनकी दृष्टि-वृति पवित्र हो, तो सोचने की बात यह है कि जब साक्षात् श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर साकार होंगे तो क्या यह देश मंदिर के सामान पवित्र नहीं होगा और यहाँ के लोग पवित्र नहीं होंगे?

श्रीकृष्ण के समय यही भारत वैकुण्ठ था, यह समस्त देश मंदिर के सामान पवित्र था और यहाँ के वासी देवी-देवता थे | जब कोई व्यक्ति सम्पति, वस्तु अथवा पदार्थ का मुख्य भाग स्वयंग ले लेता हैं तो हम मुहावरे में कहा करते हैं कि ‘मक्खन तो वह ले गया’ | चूँकि श्रीकृष्ण को सतयुगी सृष्टि का स्वराज्य मिला जिसमे सुख के सभी सार थे, इसलिए हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण के हाथ में मक्खन आ गया | इस मुहावरे को आख्यान बनाकर लोगो ने यह लिख डाला कि मटके फोड़कर मक्खन चुराया करते थे | वर्तमान समय कलियुग के अंत में ब्रह्मचर्य का व्रत लेनेवाले योगीजन, संपूर्ण पवित्रता को प्राप्त करने के पश्चात् अर्थात तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने के पश्चात् ही सतयुग के आदि में श्रीकृष्ण के सच्चे जन्मदिन को अपने नेत्रों से देख सकते हैं और स्वर्ग अथवा सतयुग में गोप-गपियाँ बन श्रीकृष्ण के साथ मंगल-मिलन भी मना सकते हैं |